काशी के समाजसेवी ने पीएम मोदी को लिखी चिट्ठी;
कहा- मेरी देह पर हो अनुसंधान,
राष्ट्र को समर्पित एक-एक अंग
कोरोना वायरस के कहर का दंश पूरा विश्व झेल रहा है। भारत में इस बीमारी से 550 से अधिक लोग संक्रमित हैं। अभी तक इस बीमारी से बचाव के लिए वैक्सीन व इलाज वैज्ञानिकों के लिए अबूझ पहेली है। हालांकि, पूरी दुनिया में इस बाबत प्रयास चल रहा है।इस बीच काशी के एक समाजसेवी सौरभ मौर्या ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखकर अपनी शरीर को रिसर्च के लिए प्रयोग करने कीबात कही है। समाजसेवी ने कहा- अगर मेरे किसी अंग की जरूरत अनुसंधान के लिए पड़े तो मैं तैयार हूं। मेरा शरीर राष्ट्र को समर्पित है। करोड़ों लोगो को बचाने के लिए मेरा शरीर काम आए तो कम है।
अब तक 12 हजार यूनिट ब्लड कराया इंतजाम
31 वर्षीय सौरभ मौर्या ने हैदराबाद विश्वविद्यालय से एमबीए करने के बाद समाजसेवा में कदम रखा था। 2012 में उन्होंने साधना फाउंडेशन बनाया। सौरभ अपने शरीर को 2018 में बीएचयू के शरीर रचना विभाग और राष्ट्रीय अंग और ऊतक प्रत्यारोपण संगठन-स्वास्थ एवं परिवार कल्याण मंत्रालय को डोनेट कर चुके है।सौरभ बताते हैं कि अब तक वो 46 बार रक्तदान, 43 बार प्लेटलेट डोनेट कर चुके हैं। साथ ही समय समय पर करीब 100 से ज्यादा शिविर लगाकर 12000 से ज्यादा यूनिट रक्त दूसरों से रक्तदान करा चुके हैं। इस संस्था के जरिए 2 घंटे में सम्पूर्ण भारत में किसी भी जरुरतमंद को रक्तदान कर रक्त मुहैया कराया जाता है।
कुछ ऐसे जागी रक्तदान की अलख
सौरभ ने बताया कि 1990 में उनकी दादी को ब्लड कैंसर हुआ था। पिता उदय नारायण मौर्या को उस समय ब्लड के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ा था। सौरभ ने बताया कि उस समय वो महज 6 माह के थे। लेकिन बड़े होने पर पिता से दादी के बीमार होने पर किस तरह एक-एक यूनिट ब्लड के लिए पिता को जद्दोजहद करनी पड़ी थी,यह कहानी बार-बार सुनने को मिली। 2010 में बीएचयू में एक थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चे के पिता को रोते देखा तो मुझे अपने पिता की याद आ गई थी। यहीं पर पहली बार ब्लड डोनेट किया था। लेकिन बच्चे की जान नहीं बची। इसके बाद दोस्तो संग मिलकर संस्था बनाई।
इस तरह घर वालों ने दिया साथ
सौरभ बताते हैं कि, साल 2015 तक घर वाले भी ब्लड डोनेट से मना करते थे। इसी साल पापा बीमार पड़े और इलाज के लिए उन्हें अहमदाबाद लेकर गया। वहां हार्ट की सर्जरी हुई। लेकिन उससे पहले डॉक्टर ने 4 यूनिट ब्लड का इंतजाम करने के लिए कहा। एक यूनिट मैंने दिया और बाकी तीन यूनिट उस अंजान शहर में मेरी टीम ने दिया। तब घर वालों को समझ में आया कि मेरी टीम कहां तक बनी है, जो लोगों की मदद करती है।source https://www.bhaskar.com

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