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Tuesday, 14 April 2020

लॉकडाउन से घर के मुखिया हुए बेरोजगार तो महिलाओं ने संभाली कमाई की कमान;

लॉकडाउन से घर के मुखिया हुए बेरोजगार तो महिलाओं ने संभाली कमाई की कमान;

 दो दिन में तैयार किए 40 हजार मास्क



लॉकडाउन से घर के मुखिया हुए बेरोजगार तो महिलाओं ने संभाली कमाई की कमान;
21 दिनों के लॉकडाउन के बावजूद देश में कोरोना के संक्रमण की चेन नहीं टूट रही है। इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अब 3 मई तक लॉकडाउन कर दिया है। इस संकट के काल में रोज कमाने खाने वालों की जिंदगी थम गई है। 

जिनके कंधों पर पूरे परिवार के भरण पोषण की जिम्मेदारी थी, अब वे घरों से बाहर नहीं जा पा रहे हैं। ऐसी हालत में परिवार की महिलाओं ने परिवार की जिम्मेदारी ले ली है। 

कुछ ऐसा ही नजारा मुजफ्फरनगर जिले के नीराना गांव का है। यहां महिलाओं ने जरूरत के हिसाब से मास्क बनाने का निर्णय लिया है। अब उनका अधिकतर समय मशीन का पहिया घुमाने में गुजर रहा है। जिससे आमदनी हो रही है और परिवार का पेट भी भर रहा है।

सोशल डिस्टेंसिंग का भी रखा जाता है ध्यान

नीराना गांव इन दिनों 70 से अधिक परिवारों की महिलाएं सिलाई मशीन से मास्क बनाने में जुटी हैं। इस दौरान कोरोना से बचाव का हर उपाय भी किया जा रहा है। महिलाएं अपने मुंह को डुपट्टे से ढंककर रखती हैं। कुछ घंटे के अंतराल पर साबुन से हाथ भी धोया जाता है। सोशल डिस्टेंसिंग का भी ख्याल रखा जा रहा है। महिलाओं ने कहा- यदि उन्हें ये काम नहीं मिलता तो भूख से मरने की नौबत आ जाती।

कच्चा माल उपलब्ध करा रही कंपनी

मुजफ्फरनगर की बाला जी पोलोपैकप्राइवेट लिमिटेडकंपनी ने निरानागांव के 70 परिवार को मास्क बनाने का ऑर्डर दिया है। करीब 150 महिलाएं मिलकर अब तक 40 हजार मास्क दो दिन में तैयार किया है। कंपनी मेहनताने के तौर पर 50 पैसे प्रति मास्क महिलाओं को दे रही है। एक महिला हर दिन औसतन 250 रुपए कमा रही है। रॉमेटेरियल भी कंपनी दे रही है। लखनऊ के कानपुररोड स्थित सरकारी हॉस्पिटल से डॉक्टरों के लिए पीपीईकिटका ऑर्डर भी मिला है।

कामगार महिलाओं ने कहा- संकट के समय उनका हुनर काम आ रहा
  • जीनत ने कहा- संकट के समय में अब हमारा हुनर काम आ रहा है।सिलाई से अब हर दिन हम 200 रूपए तक कमा लेते हैं। जिससे घर का खर्चा चला रहे हैं। रिहाना कहती हैं कि, घर के पुरुष काम बंद होने से घरों में बैठे हैं। अच्छा हुआ मास्क बनाने का काम मिल गया, वरना कैसे कटता दिन? यही सोचकर परेशान थे। सरकार से कोई मदद भी नहीं मिली है। क्योंकि हमारा कहीं पंजीकरण भी नहीं है। नाजमा कहती हैं- हम घर काम निपटाने के बाद खाली समय में मास्क बना रहे हैं। 150 से 200 रुपए तक मजदूरी मिल जाती है।
  • मोहम्मद अली ने कहा- गांव के करीब 16-17 सौ परिवार मजदूर हैं, लॉकडाउन के चलते बाहर नहीं जा पा रहे है। अगर बाहर जाएं तो पुलिस का डंडा खाएं। कुछ के राशनकार्ड बने हुए हैं कुछ के नहीं है। लेकिन मशीन पर अंगूठा लगाते समय मेल नहीं खाता तो राशन भी नहीं मिल पाता है। इस समय 70-80 परिवार ऐसे हैं, जो मास्क बनाकर अपने घर की गुजर-बसर कर रहे हैं। महिलाओ के कंधो पर ही जिम्मेदारी है। क्योकि मर्द तो काम पर ही नहीं जा रहे हैं।
  • रिहाना ने कहा- अब तक जो जमा पूंजी थी, उसे से गुजारा किया गया। लेकिन वो पैसे भी खत्म हो गए हैं। खाने का संकट खड़ा हो रहा था। इसीलिए हमने मास्क बनाना शुरू किया है। साहिबा कहती है कि, हमें मास्क सिलकर अपने परिवार का पेट भरना पड़ेगा, ये कभी सोचा भी नहीं था। यदि मास्क बनाने का काम न मिलता तो पाईपाई को मोहताज हो जाते। लॉकडाउन में मम्मी-पापा काम पर भी नहीं जा पा रहे हैं। मैं उनकी बेटी हूं, इसलिए अब अपनी जिम्मेदारी निभा रही हूं।

नीराना गांव की महिलाओं को लखनऊ के एक अस्पताल ने पीपीई किट भी तैयार करने का ऑर्डर दिया है।

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