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Tuesday, 14 April 2020

सारी बाधाओं को पार करते हुए 4 दिनों में छत्तीसगढ़ से यूपी अपने घर पहुंचा जवान,

सारी बाधाओं को पार करते हुए 4 दिनों में छत्तीसगढ़ से यूपी अपने घर पहुंचा जवान, 

मां का चेहरा और उनके साथ बिताए पल याद कर रो पड़ा

देश में 21 दिनों के लॉकडाउन का आज अंतिम दिन है। आज लॉकडाउन को और आगे तक बढ़ाए जाने की उम्मीद है। इस बीच लॉकडाउन में लोगों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

इस बीच छत्तीसगढ़ सशस्त्र बल में तैनात एक जवान को लॉकडाउन के बीच ही मां के निधन की दुखद सूचना मिली। इस खबर ने जवान संतोष को झकझोर कर रख दिया। आंखों की नमी सुखने का नाम ही नहीं ले रही थी।

मां का चेहरा और उनके साथ बिताये पल मानस पटल पर घूम रहे थे। अपने जज्बे की बदौलत चार दिन में वह अपने घर पहुंचने में कामयाब रहा। इस दौरान वह महज 7- 8 घंटे ही सो सका था। लाकडाउन में सारी बाधाओं को पार कर जब घर पहुंचा तो फफक कर रो पड़ा।

मीरजापुर चुनार तहसील क्षेत्र के सीखड़ निवासी संतोष यादव ने रास्ते में आ रही मुसीबतों को अपने बुलन्द हौसला और मित्रों के सहयोग से पार करने में कामयाब रहा। अपने इसी जज्बे के चलते दस साल में उनके नाम 78 अवार्ड दर्ज हो चुके हैं।
मां के मौत की मिली खबर : पांच अप्रैल को सुबह मां राजेश्वरी के बीमार होने की खबर आयी। पिता जय प्रकाश से मोबाइल पर वार्ता हुई। इसके बाद उन्हें लेकर वाराणसी इलाज के लिए ले गये। वहा आईसीयू में भर्ती कराया गया उपचार के दौरान उनकी न होने की जानकारी डाक्टर से मिली।कहा- मां के निधन की खबर सुनने के बाद चार दिन व तीन रातों का सफर मुश्किलों भरा रहा। भूख, प्यास और नींद को भूलकर वह सारी बाधाओं को पार कर शुक्रवार की सुबह अपने घर सीखड़ पहुंचा।

संतोष ने बताया कि घर आने के रास्ते में लॉकडाउन के बीच आने वाली तमाम मुश्किलें मां की यादों के सामने कटती गईं। इसमें साथ निभाया संतोष के गांव के नौकरी शुदा दोस्तों ने। सीएएफ के जवान संतोष यादव के घर पहुंचते ही उसके घर पर गांव के शुभचिन्तकों की भीड़ लग गयी । पिता जयप्रकाश अपने बड़े बेटे संतोष का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। मुम्बई में नौकरी करने वाला छोटा बेटा अरविंद अपनी बहन के साथ नहीं आ सका।

सीखड़ निवासी जयप्रकाश का बड़ा बेटा संतोष छत्तीसगढ़ सशस्त्र बल की 15 वीं बटालियन में बीजापुर जिले के नक्सल प्रभावित धनौर में तैनात हैं। उसकी दृष्टिबाधित माँ राजेश्वरी का निधन 5 मार्च को होने की सूचना संतोष को मिली। वह अपने घर आने के लिए बेचैन हो गया। भूख प्यास गायब हो गया।

 सात अप्रैल को नियुक्ति स्थल से रवानगी ले कर दिल में मां की यादों को सहेजे नम आंखों से वह घर के लिए निकल पड़ा। मित्रों ने लॉक डाउन के चलते होने वाली मुश्किलों से आगाह कराया।

इन सबसे बेखबर संतोष को तो अपने पिता के पास घर पहुचना था। जहां मां की ममता ने उसे पाल पोष कर इतना बड़ा किया था। राजेश्वरी के निधन के बाद उसका दाह संस्कार उसके दोनों पुत्रों के न आ पाने पर पिता द्वारा ने ही अंतिम संस्कार किया। संतोष की अभिलाषा मां के श्राद्ध कर्म में सम्मिलित होने की थी और उसके जज्बे की वजह से यह इच्छा पूरी हो गई।

लॉकडाउन में रास्ते में कईमित्रों ने की मदद

करीब 15 किलो लगेज लेकर संतोष ने चार दिन व तीन रात के सफर को मित्रों के सहयोग से पूरा किया। मंगलवार की सुबह धनौरा स्थित बटालियन से उसके सहकर्मी मित्र ने उसे अपनी बाईक से बीजापुर छोड़ा।

 बीजापुर से जगदलपुर 160 किलोमीटर की यात्रा धान लेकर जा रही ट्रक से की। जगदलपुर से कोंडागांव ट्रक से पहुँचा वहां नाका पर तैनात उसके एक पूर्व सहकर्मी ने उसे पहचान कर यात्रा सुगम बनाया। उसने संतोष की पीड़ा अपने आफिसर चंद्रा साहब को बताई।

चन्द्रा साहब के प्रयास से वह दवा लेकर जा रहे वाहन से आगे के लिए रवाना किया। वह साढ़े दस बजे रायपुर पहुंचा। रायपुर में उसने अपने दोस्त श्रीनाथ से मोबाईल पर आप बीती सुनाई। श्रीनाथ जो कि आरपीएफ में तैनात था उसने विलासपुर की ओर जाने वाली ट्रेन में अपनी ड्यूटी लगवाई और संतोष को जो अभी तक सिविल ड्रेस में था उसे वर्दी पहनने की सलाह दी। दोनों मित्र ढाई बजे रात रायपुर से चलकर विलासपुर पहुंचे। विलासपुर में ही रेलवे में बाबू पद पर तैनात अपने क्षेत्र के विकास की मदद से दो बजे की मालगाड़ी से 5 बजे शाम शहडोल पहुंचा।

शहडोल में तैनात लोको पायलट गृह ब्लॉक बिट्ठलपुर के श्रवणसिंह की मदद से 9 बजे रात कटनी पहुंचा। पूरी रात और दिन इंतज़ार के बाद अगले दिन कटनी से मालगाड़ी से साढ़े तीन बजे सतना पहुँचा। सतना से गृह ब्लॉक कालूपुर के लोको पायलट प्रशांत की मदद से मालगाड़ी से साढ़े ग्यारह बजे शंकरगढ़ पहुंचा।

वहां से दो किमी पैदल चलकर स्टेशन पहुंचा। शंकरगढ़ स्टेशन मास्टर की मदद से डेढ़ बजे रात एक इंजन पर सवार हो कर भोर में बजे छिवकी पहुँच गया।छिवकी के उप स्टेशन अधीक्षक दिवाकर नारायण ने जवान की पीड़ा व संघर्षो से द्रवित होकर उच्चाधिकारियों से बात की।

टाटा जा रही एक मालगाड़ी को रोकवाकर संतोष को एक अधिकार पत्र के साथ चुनार स्टेशन तक के लिए रवाना किया।

शुक्रवार की सुबह छह बजे चुनार स्टेशन पर उतरने के बाद संतोष बाईक सवार की मदद से डगमगपुर आया। वहां से पैदल सिंधोरा घाट पहुंच कर गंगा नदी पार किया। तब जाकर वह अपने घर पहुचा। सफर के दौरान कोयला वाले इंजन से उड़ रही कालिख से बचने के लिए साल ओढ़कर बैठना पड़ा था।

सफर के दौरान भूख प्यास गायब होने से बन्द दुकानों के कारण कोई फर्क नहीं पड़ा। दोस्तों द्वारा रखा गया ड्राई फ्रूट और अपनों के सहयोग से सफर आसान हो गया।

मां से अंतिम मुलाकात

अपने मा बाप का बड़ा बेटा संतोष इसी साल की 29 फरवरी को घर से ड्यूटी के लिए रवाना हुआ था। मां की खुशी के लिए उसे पसंद दो पैकेट नमकीन दे गया था। मां को नमकीन बहुत ही पसंद था। बिना नमकीन उनका भोजन पूरा नहीं होता था।

अपनी मां से निधन के दो दिन पूर्व ही संतोष की बात हुई थी। अपने मां बाप की संतानों में संतोष दो भाई दो बहन है। छोटा भाई और बहन रीता मुम्बई में है। बड़ी बहन सुमन बगल के जनपद भदोही में ब्याही होने की वजह से आ गयी थी।

सारी बाधाओं को पार करते हुए 4 दिनों में छत्तीसगढ़ से यूपी अपने घर पहुंचा जवान,
यूपी के मिर्जापुर में चुनार तहसील क्षेत्र के सीखड़ निवासी संतोष यादव ने रास्ते में आ रही मुसीबतों को अपने बुलन्द हौसला और मित्रों के सहयोग से पार करने में कामयाब रहा। अपने इसी जज्बे के चलते दस साल में उनके नाम 78 अवार्ड दर्ज हो चुके हैं। 


source https://www.bhaskar.com/local

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