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Wednesday, 11 March 2020

इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ यूपी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दायर की याचिका,

इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ यूपी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दायर की याचिका, 

कल होगी सुनवाई

 उत्तर प्रदेश सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के पोस्टर हटाने के फैसले के खिलाफ बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर दी। इससे पहले हाइकोर्ट नेयाचिका को स्वीकार कर लिया लिया है।

गुरुवार सुबह साढ़े दस बजे सुप्रीम कोर्ट में इसकी सुनवायी होगी। इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सोमवार को उत्तर प्रदेश सरकार को आदेश दिया था।






हाईकोर्ट ने सीएए हिंसा के आरोपियों के बैनर-पोस्टर 16 मार्च से पहले हटाए जाने का आदेश दिया था। हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपियों के पोस्टर लगाना उनकी निजता में सरकार का गैरजरूरी दखल है।

चीफ जस्टिस गोविंद माथुर और जस्टिस रमेश सिन्हा की बेंच ने कहा था कि यूपी सरकार हमें यह बता पाने में नाकाम रही कि चंद आरोपियों के पोस्टर ही क्यों लगाए गए, जबकि यूपी में लाखों लोग गंभीर आरोपों का सामना कर रहे हैं। बेंच ने कहा कि चुनिंदा लोगों की जानकारी बैनर में देना यह दिखाता है कि प्रशासन ने सत्ता का गलत इस्तेमाल किया है।

यूपी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट जाने के संकेत दिए थे

इस फैसले के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने कहा था कि इलाहाबाद कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करेगी, जिसमें अदालत ने उन होर्डिंग्स को हटाने के आदेश दिए थे, जिन पर लखनऊ में हुए प्रदर्शन के दौरान हिंसा करने वालों की तस्वीरें लगाई गई हैं।

यूपी सरकार ने 57 लोगों को 88 लाख की रिकवरी का नोटिस भेजा था

19 दिसंबर, 2019 को जुमे की नमाज के बाद लखनऊ के चार थाना क्षेत्रों में हिंसा फैली थी। ठाकुरगंज, हजरतगंज, कैसरबाग और हसनगंज में तोड़फोड़ करने वालों ने कई गाड़ियां भी जला दी थीं। राज्य सरकार ने नुकसान की भरपाई प्रदर्शनकारियों से कराने की बात कही थी।

इसके बाद पुलिस ने फोटो-वीडियो के आधार पर 150 से ज्यादा लोगों को नोटिस भेजे। जांच के बाद प्रशासन ने 57 लोगों को सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का दोषी माना। उनसे 88 लाख 62 हजार 537 रुपए के नुकसान की भरपाई कराने की बात कही गई।

लखनऊ के डीएम अभिषेक प्रकाश ने कहा था- अगर तय वक्त पर इन लोगों ने जुर्माना नहीं भरा, तो इनकी संपत्ति कुर्क की जाएगी।

हाईकोर्ट ने रविवार को सुनवाई के दौरान कहा था- कथित सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों के पोस्टर लगाने की सरकार की कार्रवाई बेहद अन्यायपूर्ण है। यह संबंधित लोगों की आजादी का हनन है।ऐसा कोई कार्य नहीं किया जाना चाहिए, जिससे किसी के दिल को ठेस पहुंचे। पोस्टर लगाना सरकार के लिए भी अपमान की बात है और नागरिक के लिए भी।

किस कानून के तहत लखनऊ की सड़कों पर इस तरह के पोस्टर लगाए गए? सार्वजनिक स्थान पर संबंधित व्यक्ति की इजाजत के बिना उसका फोटो या पोस्टर लगाना गलत है। यह निजता के अधिकार का उल्लंघन है।

सरकार के इस फैसले पर लोगों ने उठाए थे सवाल

  • श्रवण राम दारापुरी:

  • पूर्व आईपीएस दारापुरी ने कहा- फैसले से साफ हो गया कि देश में योगी सरकार की अराजकता का नहीं, कानून और संविधान का राज चलेगा। लोकतंत्र की जीत हुई, तानाशाही की हार हुई है। पोस्टर लगने के बाद हम लोगों की जान को खतरा है। अगर हमारी जान को कोई भी हानि होती है तो इसकी जिम्मेदार उत्तर प्रदेश सरकार होगी।

  • सदफ जफर: 

  • कांग्रेस नेता व एक्ट्रेस सदफ ने कहा, "ये संविधान और कानून की जीत है। कोर्ट का साफ संदेश है कि राज्य हो देश, यह तानाशाही से नहीं चलेंगे। देश संविधान और कानून से चलेगा। यह ऐतिहासिक फैसला एक नजीर है कि किसी की आवाज को दबाया नहीं जा सकता है। होर्डिंग लगने के बाद मुझे धमकी मिल रही है। हमारी निजता का हनन किया गया।'

  • दीपक मिश्रा कबीर:
  • समाजसेवी दीपक मिश्र ने कहा- सरकार ने जो किया था, वह सरासर गलत है। इसकी पुष्टि हाईकोर्ट ने भी अपने फैसले में कर दी है। कोर्ट का फैसला देश में संविधान और कानून का राज साबित करता है।


इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ यूपी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दायर की याचिका,
उप्र सरकार ने आरोपियों के लगवाए थे पोस्टर
Yogi Adityanath UP Government On Allahabad High Court Anti-CAA Protesters Hoardings Order


source https://www.bhaskar.com

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